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छत्तीसगढ़

जनसंपर्क में ‘सुशासन’: प्रिंटिंग माफियाओं पर शिकंजा, ‘प्रचार ऐप’ से आउटडोर मीडिया की रीयल-टाइम निगरानी

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी प्रचार-प्रसार व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए व्यापक प्रशासनिक सुधार शुरू किए गए हैं। जनसंपर्क विभाग ने एक ओर प्रिंटिंग कार्यों में लंबे समय से चली आ रही अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई करते हुए कथित प्रिंटिंग माफिया पर लगाम कसने की पहल की है, वहीं दूसरी ओर आउटडोर मीडिया की निगरानी के लिए तकनीक आधारित “प्रचार ऐप” लागू कर दिया गया है। इन दोनों कदमों को शासन के खर्च में पारदर्शिता लाने और सिस्टम को आधुनिक बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

प्रिंटिंग व्यवस्था में वर्षों से अनियमितताएं

सूत्रों के अनुसार सरकारी विभागों में प्रिंटिंग कार्यों को लेकर लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं। आरोप थे कि पुराने टेंडरों के आधार पर सीमित निजी प्रिंटरों को लगातार काम दिया जा रहा था, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई थी और भंडार क्रय नियमों का उल्लंघन हो रहा था। कई मामलों में शासकीय संस्थाओं को दरकिनार कर सीधे निजी एजेंसियों को काम सौंपा गया। बताया जाता है कि हर साल 50 से 60 करोड़ रुपये तक की प्रिंटिंग में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं होती थीं। इसमें गुणवत्ता नियंत्रण, कागज की आपूर्ति और भुगतान प्रक्रिया तक में पारदर्शिता की कमी की शिकायतें सामने आई थीं।

‘संवाद’ के माध्यम से ही होगी छपाई

इन अनियमितताओं को रोकने के लिए अब यह व्यवस्था लागू की गई है कि सभी शासकीय प्रिंटिंग कार्य “संवाद” के माध्यम से ही कराए जाएंगे। यदि किसी विभाग को अन्य एजेंसी से छपाई करानी है तो पहले “संवाद” से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना अनिवार्य होगा। बिना NOC के किसी भी प्रकार का भुगतान कोषालय से जारी नहीं किया जाएगा। इस निर्णय से प्रिंटिंग कार्यों में केंद्रीकरण के साथ-साथ निगरानी बढ़ने की उम्मीद है।

टेंडर प्रक्रिया निरस्त, नई पॉलिसी पर काम

प्रिंटिंग से जुड़ी लगातार शिकायतों को देखते हुए मौजूदा टेंडर प्रक्रिया को निरस्त कर दिया गया है। विभाग अब एक नई और पारदर्शी प्रिंटिंग पॉलिसी तैयार कर रहा है। इसके लिए अन्य राज्यों की मुद्रण नीतियों का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि एक बेहतर और जवाबदेह प्रणाली लागू की जा सके।

सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में आउटडोर मीडिया की अहम भूमिका है। इसमें होर्डिंग्स, यूनिपोल्स, डिजिटल वॉल पेंटिंग्स, ब्रांडिंग और एलईडी वैन अभियान शामिल हैं। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल और प्रमुख सड़कों जैसे स्थानों पर इनका प्रभाव व्यापक होता है। हालांकि, इस क्षेत्र में मॉनिटरिंग एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। कई शिकायतों में यह सामने आया कि वेंडर्स द्वारा विज्ञापन लगाने में देरी की जाती है या तय अवधि से पहले उन्हें हटाकर व्यावसायिक विज्ञापन लगा दिए जाते हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए जनसंपर्क विभाग ने तकनीक आधारित “प्रचार ऐप” विकसित किया है। यह एक एंड-टू-एंड मॉनिटरिंग सिस्टम है, जो तीन चरणों में काम करता है—

पहले चरण में विभाग प्रचार अभियान की योजना बनाता है और एजेंसियों को कार्य आवंटित करता है।

दूसरे चरण में वेंडर्स क्रियान्वयन की तैयारी करते हैं और एसेट्स को माउंटर्स को सौंपते हैं।

तीसरे चरण में माउंटर्स मैदानी स्तर पर निर्धारित स्थानों पर विज्ञापन सामग्री स्थापित करते हैं।

रीयल-टाइम निगरानी सुनिश्चित करने के लिए माउंटर्स को एंड्रॉइड ऐप के जरिए जियो-टैग्ड और टाइम-स्टैम्प्ड फोटो अपलोड करना अनिवार्य किया गया है। उन्हें स्थापना से पहले, स्थापना के तुरंत बाद और अभियान अवधि के दौरान प्रतिदिन कम से कम एक फोटो अपलोड करना होगा।

इन तस्वीरों की पहले वेंडर एजेंसी और फिर विभाग द्वारा ऑनलाइन समीक्षा की जाएगी। इससे प्रत्येक आउटडोर एसेट की अलग-अलग ट्रैकिंग संभव होगी और किसी भी गड़बड़ी पर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी।

यह नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से होर्डिंग्स और यूनिपोल्स के लिए लागू कर दी गई है। विभाग की योजना है कि इसे जल्द ही एलईडी स्क्रीन, ब्रांडिंग और डिजिटल वॉल पेंटिंग्स जैसे अन्य माध्यमों तक भी विस्तारित किया जाए।

जनसंपर्क आयुक्त रजत बंसल ने 28 अप्रैल को पैनल में शामिल एजेंसियों के साथ कार्यशाला आयोजित कर इस नई प्रणाली को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक आधारित मॉनिटरिंग से ही पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।

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