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छत्तीसगढ़

एरियर्स की मांग पर कर्मचारी को लगा झटका, हाईकोर्ट ने याचिका कर दी खारिज

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुंगेली जनपद पंचायत के एक कर्मचारी द्वारा 17 वर्षों के कथित अंतर वेतन (एरियर) की मांग को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने नियमितीकरण का आदेश बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया था और इसके छह वर्ष बाद एरियर की मांग को लेकर अदालत पहुंचे, जो स्वीकार्य नहीं है।यह फैसला हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने सुनाया। याचिका जनपद पंचायत मुंगेली में वर्तमान में लेखापाल के पद पर कार्यरत रामकुमार दीक्षित द्वारा दायर की गई थी।

1998 में हुई थी नियुक्ति, फिर निरस्त हुआ आदेश

मामले के अनुसार रामकुमार दीक्षित की नियुक्ति 31 जुलाई 1998 को जनपद पंचायत मुंगेली में सहायक ग्रेड-3 के पद पर हुई थी। हालांकि सामान्य सभा से अनुमोदन नहीं मिलने के कारण 13 नवंबर 1998 को उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई।नियुक्ति निरस्त होने के बाद याचिकाकर्ता ने तत्कालीन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत से स्थगन आदेश मिलने के कारण वे सेवा में बने रहे और मामला लंबे समय तक न्यायालय में लंबित रहा।

2015 में हुआ नियमितीकरण, एरियर का दावा हुआ खारिज

वर्ष 2015 में न्यायालय ने मामले का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता की सेवाओं को नियमित करने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने 31 जुलाई 1998 से 22 जून 2015 तक के कथित अंतर वेतन अथवा एरियर के भुगतान संबंधी मांग को खारिज कर दिया था।इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने करीब छह वर्ष बाद फिर से एरियर की मांग को लेकर नई याचिका दायर की। उनका दावा था कि नियमितीकरण की अवधि के दौरान वेतन संबंधी लाभ उन्हें मिलना चाहिए।

लंबे समय तक मौन रहने पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पुराने एरियर का दावा पेश किया गया, जबकि राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध किया गया। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 2015 के आदेश को बिना किसी आपत्ति या चुनौती के स्वीकार कर लिया था और लंबे समय तक कोई कदम नहीं उठाया।अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कानून केवल उन्हीं लोगों की सहायता करता है जो अपने अधिकारों के प्रति समय पर सजग रहते हैं। लंबे समय तक उदासीन बने रहने वाले व्यक्ति को बाद में राहत नहीं दी जा सकती।

बिना विरोध आदेश स्वीकारना पड़ा भारी

कोर्ट ने माना कि नियमितीकरण के आदेश को बिना किसी विरोध के स्वीकार करना याचिकाकर्ता द्वारा अपने दावे के अधिकार का परित्याग (वेवर) माना जाएगा। ऐसे में वर्षों बाद उसी मुद्दे को लेकर पुनः राहत मांगना न्यायसंगत नहीं है।

सरकार की दलील से सहमत हुआ न्यायालय

राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत तर्कों में कहा गया कि इतने लंबे समय बाद एरियर संबंधी दावा स्वीकार करने से शासन पर अनावश्यक वित्तीय भार पड़ेगा और यह प्रशासनिक सिद्धांतों के विपरीत होगा।हाई कोर्ट ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि देरी से दायर की गई वित्तीय दावों वाली याचिकाओं को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।

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