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धर्मनगरी आरंग में राजा मोरध्वज महोत्सव 2026 का भव्य शुभारंभ आज, ऐतिहासिक-धार्मिक विरासत का होगा उत्सव

रायपुर। धर्म नगरी आरंग की गौरवशाली परंपरा और ऐतिहासिक वैभवशाली राजा मोरध्वज आरंग महोत्सव 2026 का शुभारंभ छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा व राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री टंकराम वर्मा एवं कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार मंत्री गुरु खुशवंत साहेब सहित अन्य जनप्रतिनिधि करेंगे । महोत्सव का शुभारंभ शाम 4:00 बजे बाबा बागेश्वर नाथ की पूजा अर्चना के साथ इंदौर स्टेडियम आरंग में किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से समृद्ध भूमि आरंग को भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की चरण-रज से पावन माना जाता है। मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम के चरण आरंग की धरती पर पड़े, वहीं द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का आगमन भी इस क्षेत्र में हुआ। आरंग स्थित कौशल्या धाम को भगवान श्रीराम का ननिहाल माना जाता है, जिससे इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

राजा मोरध्वज की भूमि आरंग

इसी पावन अंचल से जुड़ी है छत्तीसगढ़ के रतनपुर के महान दानवीर और परम भक्त राजा मोरध्वज (मयूरध्वज) की अमर कथा। यह कथा महाभारत काल के पश्चात की मानी जाती है, जब अर्जुन को यह अभिमान हो गया था कि श्रीकृष्ण का उनसे बड़ा कोई भक्त नहीं है। अर्जुन के इस अहंकार को तोड़ने और सच्ची भक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने लीला रची।

श्रीकृष्ण ब्राह्मण वेश में अर्जुन के साथ राजा मोरध्वज के पास पहुंचे और बताया कि उनका साथ चल रहा शेर भूखा है तथा उसे भोजन चाहिए। जब राजा ने शेर के भोजन की व्यवस्था पूछी तो श्रीकृष्ण ने परीक्षा लेते हुए कहा कि शेर को राजा के इकलौते पुत्र ताम्रध्वज (धीरध्वज) का मांस चाहिए और शर्त यह रखी कि इस दौरान राजा या रानी की आंख से एक भी आंसू नहीं गिरना चाहिए।

राजा मोरध्वज और रानी ने अद्वितीय त्याग और भक्ति का परिचय देते हुए बिना किसी शोक या आंसू के अपने पुत्र का सिर आरी से काटकर शेर को अर्पित कर दिया। उनकी इस निष्काम भक्ति और दानशीलता से भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने विराट रूप के दर्शन कराए और पुत्र ताम्रध्वज को पुनर्जीवित कर दिया। इस प्रकार न तो पुत्र की स्थायी मृत्यु हुई और न ही परिवार को शोक सहना पड़ा, बल्कि भगवान की कृपा से सभी को मोक्ष की प्राप्ति हुई।

यह कथा राजा मोरध्वज की अगाध भक्ति, अद्वितीय दानशीलता और निस्वार्थ सेवा-भाव का प्रतीक है। छत्तीसगढ़, विशेषकर रतनपुर और आरंग क्षेत्र में यह कथा आज भी लोकआस्था का केंद्र है। इससे जुड़े मेले, उत्सव और धार्मिक आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं और नई पीढ़ी को त्याग, भक्ति और मानव मूल्यों की प्रेरणा देते हैं।

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