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मार्कफेड की FRK टेंडर प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता का आरोप, कांग्रेस नेता कन्हैया अग्रवाल ने कहा- 80 प्रतिशत स्थानीय उद्योग बंद होने की कगार पर

रायपुर। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री कन्हैया अग्रवाल ने मार्कफेड द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए जारी फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने प्रदेश के खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल और मार्कफेड के प्रबंध संचालक जितेंद्र शुक्ला को ज्ञापन भेजकर नई, पारदर्शी और व्यावहारिक शर्तों के साथ टेंडर जारी करने का आग्रह किया है।

कन्हैया अग्रवाल ने अपने बयान में कहा कि छोटे और मध्यम स्थानीय उद्योगों को दरकिनार करने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञापन में बताया गया है कि 26 दिसंबर को जारी नए कैलेंडर और टेंडर की शर्तों में अचानक किए गए बदलावों के कारण छत्तीसगढ़ के लगभग 80 प्रतिशत स्थानीय FRK प्लांट दौड़ से बाहर हो गए हैं। शर्तों को इस तरह तैयार किया गया है, जिससे केवल 20 प्रतिशत स्थानीय मिलर्स और बाहरी राज्यों के बड़े मिलर्स को ही लाभ मिल सके। यह कदम न केवल स्थानीय उद्यमियों के हितों के खिलाफ है, बल्कि छत्तीसगढ़ भंडार क्रय अधिनियम का भी खुला उल्लंघन है। टेंडर की शर्तों में किए गए व्यापक परिवर्तन के लिए कम से कम 15 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाना था, जो नहीं दिया गया है।

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर संकट के बादल छा सकते हैं। कन्हैया अग्रवाल ने चेतावनी दी कि यदि स्थानीय प्लांटों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर रखा गया, तो राज्य में FRK की आपूर्ति बाधित होगी। FRK की कमी के कारण राइस मिलर्स सरकार को PDS के लिए चावल उपलब्ध नहीं करा पाएंगे, जिससे प्रदेश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह प्रभावित हो सकती है। साथ ही राजस्व को लगभग 200 करोड़ रुपये की हानि की आशंका भी है।

भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगाते हुए कन्हैया अग्रवाल ने कहा कि पूर्व में FRK राइस की खरीदी 39 रुपये प्रति किलो की दर पर हुई थी। वर्तमान टेंडर में इसे 60 रुपये प्रति किलो से अधिक दर पर खरीदने की तैयारी है। इस मूल्य वृद्धि से शासन को लगभग 175 से 200 करोड़ रुपये का सीधा वित्तीय नुकसान होगा, जो कुछ चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने की सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।

कांग्रेस महामंत्री ने स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य सरकार एक ओर खाद्य फोर्टिफिकेशन के क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर मार्कफेड की यह प्रक्रिया स्थापित उद्योगों को ‘बंद’ करने की ओर धकेल रही है। यदि शासन-प्रशासन द्वारा टेंडर प्रक्रिया को तुरंत निरस्त कर पारदर्शी नीति नहीं अपनाई गई, तो स्थानीय मिलर्स के हितों की रक्षा हेतु न्यायालय की शरण ली जाएगी और टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की जाएगी।

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