मातृत्व अवकाश पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश केवल नियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि संविदा, दैनिक वेतनभोगी, मस्टर रोल और अतिथि कर्मचारियों को भी मातृत्व अवकाश का लाभ दिया जाना चाहिए। नौकरी की प्रकृति के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व अवकाश एक वैधानिक, संवैधानिक और मानवीय अधिकार है, जिसे केवल कर्मचारी की नियुक्ति की श्रेणी के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।
अतिथि व्याख्याता की याचिका पर आया फैसला
मामला रायपुर की एक महिला अतिथि व्याख्याता द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने मातृत्व अवकाश अवधि का वेतन नहीं दिए जाने को चुनौती दी थी। विभाग ने यह कहते हुए लाभ देने से इनकार कर दिया था कि वह नियमित कर्मचारी नहीं बल्कि अतिथि व्याख्याता हैं।मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विभाग के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया और कहा कि किसी महिला कर्मचारी को केवल “अतिथि” या “संविदा” कर्मचारी बताकर मातृत्व संबंधी लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
नौकरी की प्रकृति के आधार पर नहीं हो सकता भेदभाव
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मातृत्व एक प्राकृतिक और सामाजिक दायित्व है। ऐसे में महिला कर्मचारी की नियुक्ति का स्वरूप चाहे नियमित हो, संविदा हो, दैनिक वेतनभोगी हो या मस्टर रोल पर कार्यरत हो, उसे मातृत्व संरक्षण और अवकाश के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि मातृत्व अवकाश को केवल सेवा शर्तों का विषय मानना उचित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की गरिमा और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है।
विभाग का फैसला माना गलत
हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के उस निर्णय को गलत ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता को मातृत्व अवकाश अवधि का वेतन देने से इनकार किया गया था।अदालत ने कहा कि “अतिथि कर्मचारी” होने के आधार पर वेतन रोकना कानून की भावना के विपरीत है और महिला कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन है।
तीन माह में भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को मातृत्व अवकाश अवधि का बकाया वेतन तीन महीने के भीतर भुगतान किया जाए।
हजारों महिलाओं को मिलेगा फायदा
कानूनी जानकारों के अनुसार इस फैसले का असर केवल एक याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य में कार्यरत हजारों संविदा, दैनिक वेतनभोगी, मस्टर रोल और अतिथि महिला कर्मचारियों को इस निर्णय से राहत मिल सकती है।यह फैसला शिक्षा, स्वास्थ्य, पंचायत, नगरीय प्रशासन और अन्य विभागों में कार्यरत बड़ी संख्या में महिला कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।




