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खुशखबरीः 48 घंटे के अंदर मॉनसून की भारत में होगी एंट्री

नई दिल्ली। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार मॉनसून को लेकर खुशखबरी सामने आई है। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून केरल में दस्तक देने वाला है। जी हां… 48 घंटे के अंदर मानसून की भारत में एंट्री होने वाली है। भारतीय मौसम विभाग यानी आईएमडी (IMD) के अनुसार 4 जून को केरल में मॉनसून की एंट्री होगी। इस दिन केरल में भारी बारिश की भविष्यवाणी की गई है।

मॉनसून इस बार तीन दिन की देरी से आ रहा है। आमतौर पर मॉनसून 1 जून के आसपास केरल में आ जाता है। पिछले दिनों IMD ने तय समय से पहले 26 मई का आमने का अंदेशा जताया था। हालांकि El Nino के प्रभाव के कारण यह श्रीलंका में रूका हुआ था। अब मौसम विभाग ने इसके 4 जून को केरल में आने की संभावना जताई है।

IMD के मुताबिक, मॉनसून 4 जून को केरल पहुंचेगा। पूरे केरल में सात दिन तक ‘ऑरेंज’ या ‘येलो’ अलर्ट जारी किया गया है। साथ ही उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर भारी बारिश जारी रहती है तो हमें सतर्क रहना चाहिए। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों के लिए प्रतिबंधों के साथ ऑरेंज अलर्ट रहेगा। इसके बाद मॉनसून अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के कई इलाकों में भी मॉनसून के आगे बढ़ने की अच्छी संभावना है। मॉनसून केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों, लक्षद्वीप, अरब सागर के दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व भागों, साथ ही बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-मध्य, पूर्व-मध्य, उत्तर-पूर्वी और शेष दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में आगे बढ़ेगा।

मॉनसून पर El Nino का असर

भारतीय मौसम विभाग ने इस बार देश में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। इसका मुख्य कारण El Nino की स्थिति है। IMD के अनुसार प्रशांत महासागर के भूमध्य रेखीय क्षेत्र में न्यूट्रल स्थिति से El Nino की स्थिति बन रही हैय़ जून में यह कमजोर रहेगा, लेकिन सितंबर तक मध्यम से मजबूत हो सकता है। El Nino की स्थिति भारत में मॉनसून की बारिश को कम कर देती है। इससे भारत को इस साल लंबी अवधि के औसत (LPA) की सिर्फ 90 प्रतिशत ही बारिश मिलने की उम्मीद है।

LPA क्या है?

यह 1971 से 2020 तक के 50 सालों का औसत है. पूरे भारत में मॉनसून का औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है। अगर 90 प्रतिशत से कम बारिश हुई तो IMD इसे ‘कम’ (Deficient) श्रेणी में रखता है।

कम बारिश से कृषि और भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट

बता दें कि भारत में कृषि क्षेत्र पूरी तरह से मॉनसूनी पर निर्भर है। लिहाजा मॉनसून में होने वाली किसी भी तरह की देरी या कमी का सीधा असर देश के करोड़ों किसानों और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है। जून के महीने में अल-नीनो के कमजोर रहने से शुरुआती बुवाई में तो मदद मिल सकती है। हालांकि सितंबर तक इसके मजबूत होने की आशंका ने खरीफ फसलों (जैसे धान, दलहन और तिलहन) के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यदि सितंबर में बारिश बेहद कम होती है, तो फसलों के पकने के समय उन्हें पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। सरकार और कृषि विशेषज्ञ अभी से ही किसानों को कम पानी में उगने वाली फसलों को प्राथमिकता देने की सलाह दे रहे हैं।

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